क्यों मनाया जाता है सरहुल, क्या है शोभायात्रा का इतिहास ?

रांची: झारखंड में सरहुल कई जनजाति मनाते हैं, लेकिन खास तौर पर मुंडा, हो और उरांव इस त्योहार को मनाते हैं. इस पर्व के बाद नई फसल की कटाई शुरु हो जाती है. सरहुल में प्रकृति की पूजा होती है. इस दौरान विशेष पोशाक लड़के सफेद धोती और सफेद, कमीज-बनियान पहनते हैं तो महिलाएं लाल पाढ़ वाली साड़ी और बालों में फुल लगाए रहती हैं. इस दौरान सरहुल नाच, साल पेड़ की पूजा होती है. खानपान में हड़िया के साथ सुखी हुई मछली, कई तरह के पत्ते, फल, बीज खाए जाते हैं. इससे जुड़े कार्यक्रम, मिलन समारोह कई दिनों तक चलता रहता है.

सरहुल शोभायात्रा का इतिहास

सरहुल के शोभायात्रा का इतिहास लगभग 62साल पुराना है. 1961 में सिरमटोली सरना स्थल को बचाने के लिए की गयी थी. सिरमटोली गांव के सरना स्थल की जमीन को चमरा पाहन के बेटे मोगो हंस और पुजार मंगल पाहन ने रामगढ़ के एक कारोबारी के हाथों बेचने की कोशिश की गयी थी. ग्रामीणों ने एकजुट होकर इसका विरोध किया था. तब से लेकर आज तक शोभायात्रा निकाली जा रही है. पहले के तीन वर्षों तक यह शोभायात्रा करमटोली स्थित शशि भूषण मानकी के आवास के निकट स्थित उसी साल वृक्ष से लेकर सिरम टोली सरना स्थल तक जाती थी. 1964 से इस पूजा का आयोजन हातमा सरना स्थल में किया जाने लगा और वहीं से शोभायात्रा निकाली जाने लगी. पहली बार कार्तिक उरांव को बैलगाड़ी पर बैठाकर करीब 100 लोगों के साथ सिरमटोली के सरनास्थल तक जुलूस निकाली गई थी. 1967 में कार्तिक उरांव लोहरदगा और करमचंद भगत बेड़ो से विधायक बने, तब जिला प्रशासन ने दोनों की लोकप्रियता और जनसमूह की भावना का सम्मान करते हुए शोभायात्रा के लिये पांच जीप उपलब्ध कराया था. इस तरह 100 लोगों के साथ शुरु हुई सरहुल की शोभायात्रा आज विशाल जुलूस में बदल गई है. जहां लोग पारंपरिक वेशभूषा में ढोल नगाड़ों के साथ सड़क पर निकलते हैं. आधुनिकता के दौर में अब डीजे भी झांकियों का हिस्सा बन गए हैं.

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